shree ram

राम मेरे या आपके नहीं है .. राम हमारे हैं.. भगवान राम का नाम हम सभी से जुड़ा हुआ है..

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आलेख: बृजेश चन्द्र पाठक




राम मेरे या आपके नहीं है ..  राम हमारे हैं..
भगवान राम का नाम हम सभी से जुड़ा हुआ है..
कुछ लोगों से श्रद्धा की वजह से और कुछ लोगों से राजनीतिक वजहों से …

राम का नाम आते ही एक और नाम आता है दिमाग़ में और वो है अयोध्या .. भगवान राम का प्राकट्य स्थल .. जहाँ कभी भव्य राम मंदिर हुआ करता था फिर एक सरबुलंद मस्जिद हुई और आजकल मस्जिद के टूटें अवशेषों के बीच टेंट में श्रीराम मंदिर … और उस मंदिर के इर्द गिर्द चुनावी दौर में घूमती राजनीतिक बयानबाज़िया ही बची है..
भगवान राम सातवें अवतार थे, मर्यादापुरूषोत्तम थे और हिंदुओं की श्रद्धा के केंद्र थे , है और रहेंगे.. ऐसे में उनके जन्म्स्थल से मोह होना और श्रद्धा रखना स्वाभाविक हैं.. सांप्रदायिक बिलकुल भी नहीं ..
मार्क्सवादी इतिहासकार भगवान श्रीराम को काल्पनिक मानते है लेकिन अयोध्यावासी इस महानायक के गुणगान इंडोनेशिया की ककविन रामायण थाईलैंड की राम कियेंन और लाओस की फालाम और पोम्मचाक जैसी रचनायें गाती है और राम को वैश्विक आधार देती है .. अथर्ववेद में (१०२:३२) में अयोध्या का वर्णन है. भारत देश में विशेषकर पूर्वी भारत में एक कहावत भी कही जाती है…

“गंगा बड़ी गोदावरी , तीरथ बड़ा प्रयाग .
सबसे बड़ी अयोध्या नगरी , जहाँ राम लियो अवतार.”

अब ये प्रश्न आना स्वाभाविक है की भगवान राम का जन्म्स्थल विवादित क्यूँ हो गया ??
ये सब शुरू हुआ १५२८ ईसवी में .. जब ज़्यादातर युद्ध धर्म और साशन के विस्तार के लियें लड़े जाते थे .. इसी क्रम में बाबर के सेनापति ने रामजन्मभूमि मंदिर को ध्वस्त कर दिया और बाद में वहाँ पर एक सरबुलंद (ऊँची) मस्जिद बनवायी गयी जो कालांतर में बाबरी मस्जिद कहलायी.. १९२१ में विलियम फ़ोस्टर ने अर्ली ट्रैवल्ज़ इन इंडिया में,ऑस्ट्रीअ के नागरिक  टाईफ़ेएन्थलर जो १७६६-७१ तक अयोध्या में रहे discription historic at geographic de el inde में  इसके घटना बारे में लिखा हैं. कई इस्लामिक विचारक जैसे हाजी मोहम्मद (जिया ए अख़्तर ), मोहम्मद अमजत अली काकोरवि (तारीखे अवध और मरक्काए खसरवि) ने भी यही बताया है.
और तब से शुरू हुआ राम जन्म भूमि आंदोलन, अपने आराध्य के जन्मस्थली को वापस लेने का संघर्ष..  जी हाँ राम मंदिर आंदोलन १९८० में नहीं १५२८ में ही आरंभ हो गया था..




१५२८ से १८५७ तक , बाबर से वाजिद अली शाह तक ७४ बार हिंदू वीरों ने सशत्र संघर्ष किये. ब्रिटिश शासन में भी २ बार प्रयास किये गये , १९३४ में तीन गुम्बज भी तोड़ दिये गये थे जिसे अंग्रेजो ने पुनः बनवा दिया परंतु १९३४ के बाद मुस्लिम समाज ने बाबरी मस्जिद में प्रवेश नहीं किया. पहला हिंदू मुस्लिम दंगा इस मुद्दे को लेकर १८५३ में हुआ जिसके बाद १८५९ में अंग्रेज़ी हुकूमत ने हिंदू और मुसलमानो के लियें पूजा/नमाज़ की जगह तय कर दी, यह व्यवस्था ९० साल तक शांतिपूर्वक बनी रही..
आज़ादी के बाद १९४९ के डिसेम्बर महीने में मूर्तियाँ स्थापित की गयी यही समय था जब इस मुद्दे का राजनीति करण हुआ.. नेहरू जी ने तब डी॰एम॰ के के के नायर को मूर्ति हटाने को कहा, लेकिन नायर साहब ने मना कर दिया. जिसके बाद १९६१ में ये मामला न्यायालय में गया.. ८० के दशक में राम मंदिर निर्माण एक जनआंदोलन बन कर सामने आया और ९० के दशक में ये अपने चरम पर था.. ये वही समय था जब जनता दल की सरकार के मुख्यमंत्री मुलायम सिंघ यादव ने हज़ारों कारसेवकों पर गोलियाँ चलाने का आदेश दिया था. फिर भाजपा शासनकाल में कल्याण सिंघ के मुख्यमंत्री रहते हुए लाखों कारसेवकों के हुजूम ने बाबरी मस्जिद को गिरा दिया.. हज़ारों लोग इसके बाद हुए दंगे में मारे गये ..उसके बाद से आज तक राजनीतिक दल इस मुद्दे को हथियार बना कर कोई पक्ष में होकर तो विपक्ष में होकर अपनी अपनी रोटियाँ सेंक रहा हैं …

और आम हिन्दू आज भी अपने दिल में अपने भगवान अपने आराध्य अपने आस्था के केंद्र श्री राम के उनकी ही जन्मस्थली पर एक भव्य मंदिर की सोच रहा हैं … याद रखे .. राम मंदिर निर्माण एक जनआंदोलन था है और रहेगा..
आप लोग भी मेरा तुम्हारा छोड़ कर हमारे राम की जन्मस्थली और मंदिर के बारे में सोचे और इसे अपना मुद्दा बनाये.  किसी पार्टी का मुद्दा नहीं बनने दे …




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