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आत्म-गौरव को सबसे अधिक ठेस पहुँचाने और आत्मा को तत्काल तिरस्कृत करने वाली यदि कोई वृत्ति है तो वह है, भिक्षावृत्ति।

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आलेख: बृजेश चन्द्र पाठक




भिक्षावृत्ति …

आत्म-गौरव को सबसे अधिक ठेस पहुँचाने और आत्मा को तत्काल तिरस्कृत करने वाली यदि कोई वृत्ति है तो वह है, भिक्षावृत्ति। इस भिक्षावृत्ति का कुप्रभाव न केवल भिखारी के आत्म-सम्मान पर पड़ता है बल्कि इससे राष्ट्रीय गौरव को भी हानि पहुँचती है। एक तो भिखारियों की वृहत संख्या के कारण हर गाँव, शहर, गली-कूँचों तथा ग्राम सड़कों पर भिक्षुक-ही-भिक्षुक दृष्टिगोचर होते हैं, जिससे ऐसा लगता है मानो भारत सामान्य, सज्जन अथवा परिश्रमी व्यक्तियों का देश न होकर, भिखारियों का देश हो। भारत में आप कही भी चले जाए आपको भिखारी ज़रूर मिल जाएँगे .. कभी अल्लाह कभी ईश्वर के नाम पर माँगते हुए..कभी अपने बच्चे के दूध के लियें कभी भूखे पेट के लियें.. २०११ की जनगड़ना के मुताबिक़ कुल ४ लाख के आस पास इनकी संख्या हैं और इनमे से २१ फ़ीसदी लोग पढ़े लिखें हैं.. ३-४ हज़ार ऐसे भी है जिनके पास डिग्री और डिप्लोमा भी है ..जी हाँ चौंकिए मत, भिखारी प्रोफ़ेशनल डिग्री धारी भी हो सकता है.

भिक्षावृत्ति भारत या विश्व के लियें नयी बात नहीं है .. दान लेना और दान देना दोनो ही बातों का भारतीय संस्कृति और सभ्यता का अभिन्न अंग है. यह पुण्य का भागी बनाता हैं.. गीता में भगवान कहते है . “यज्ञ दान तपः कर्म न त्याज्यं कार्यमे तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषणाम्॥” अर्थात् यज्ञ, दान, तप-रूप जो कर्म हैं, वह त्यागने योग्य नहीं है। यह कर्म निश्चित रूप से बुद्धिमान लोगों को पवित्र करने वाले हैं। सुदामा चरित में कहा गया है ” बामन का धन केवल भिक्षा”.

सुदामा भी अपने मित्र स्वयं भगवान श्री कृष्ण से भिक्षा ली थी. गीता के अतिरिक्त अन्य धर्म-शास्त्रों में दान की महिमा का बखान किया गया है। मनु भगवान का कथन है— ‘तपः परं कृतयुगे त्रेतायाँ ज्ञान मुच्यते। द्वापरे यज्ञ मेवादुयनिमेक कलौ युगे॥’ अर्थात्, सतयुग में तप, त्रेता में ज्ञान, द्वापर में यज्ञ और कलियुग में दान ही धर्म के विशेष लक्षण हैं। लेकिन इनहि ग्रंथो में ये भी बताया गया है के दान लेने वाला कौन हो सकता . कौन याचक उपयुक्त है. कही कोई धन के लालच में याचक तो नहीं बन गया. कुंती का अर्जुन मोह में ग्रसित होकर कर्ण से कवच कुण्डल माँगना और कर्ण का बिना अपनी मृत्यु की सोचे दान कर देना उत्कृष्ट याचक और दाता का उदाहरण हैं. भगवान बुद्ध भी भिक्षु ही रहे जीवन पर्यन्त. महान कवि कविवर घाघ ने भिक्षावृत्ति को जीवन यापन का आख़िरी साधन बताते हुए कहा है .. “उत्तम खेती मध्यम वान, निषद चाकरी भीख निदान”. कबीर दास जी ने भी पेट भरने लायक माँगने को उचित कहा है ..

अनमांगा तो अति भला, मांगि लिया नहि दोश उदर समाता माँगी लेय, निश्चय पाबै मोक्ष। कबीर दास जी का ये भी कहना है के माँगा ना जाये यही सर्वदा उपयुक्त हैं. आब गया आदर गया, नैनन गया सनेह येह तीनो तभी गया, जभी कहा कछु देह। मांगन मरन समान है, तोही दियो मैं सीख कहै कबीर समुझाय के, मति कोयी मांगे भीख। सभी मतो का मानना यही है के अगर भिक्षा ना माँगी जाये तो ज़्यादा अच्छा है .. अगर आप इस लायक है के नित्यक्रिया ख़ुद कर लेते है तो कुछ कर्म करके जीवीका अर्जित करे .. सम्मान के साथ . परंतु कालांतर में दान लेना भिक्षा लेना एक व्यवसाय बन गया .. बहुत ही शर्मिंदगी वाला बहुत मेहनत न ख़र्च कराने वाला और थेथरई वाला व्यवसाय.. जिसमें कमाई लागत से बहुत ज़्यादा थी. अलग अलग तरह के याचक अलग अलग तरह के हथकंडों से लैश याचक आ गये मार्केट में. मंदिर के बाहर अब्दुल तिलक लगाये भगवा धारण किये भोलेनाथ कल्याण करेंगे बोलते हुए तो मज़ार के बाहर रमेश हरे कुर्ते लूँगी में बाबा बंदानवाज़ सब पूरा करेंगे बोलते हुए.




आश्रम चौक पर एक अधेड़ औरत जो चाहे तो कही भी काम कर सकती हाथ पैर से मज़बूत. किसी और का बच्चा गोद में और धूद की बोतल दिखा के माँगने वाली औरत. आँख होते हुए अंधा होने का नाटक करने वाला. फ़र्ज़ी हिजड़ा बन के माँगने वाला..बच्चे जो अक्सर चुरा लियें गये होते है छोटे शहरों से .. ना सुनो तो शीशे पे अलग हाथ मार मार के माँगेंगे. मतलब एक पूरा सिस्टम बना रखा है भीख माँगने का. हमारे देश में क़ानून भी बना है भिक्षावृत्ति रोकने के लियें .. अफ़सोस है कि पूर्ण रूप से लागू नहीं हो पा रहा. और भीख माफ़ियाँ बहुत ही सुचारू रूप से इस व्यवसाय को कर पा रहे है. हम एक पहल कर सकते है.. जिन्होंने ने इसे व्यवसाय बना रखा है उन्हें भीख न देकर. अगर आपको दान देने की इच्छा है तो याचक ढूँढने में थोड़ी मेहनत करे जिस से दान योग्य याचक तक पहुँचे. मांगन मरन समान है, मति कोयी मांगो भीख मांगन ते मरना भला, येह सतगुरु की सीख।




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